यह सवाल शायद थोड़ा अजीब लगे।
शायद थोड़ा कड़वा भी।
लेकिन अलग-अलग माइक्रोड्रामा प्लेटफॉर्म्स पर काम करने के बाद मेरे मन में एक सवाल लगातार उठ रहा है—
क्या वर्टिकल ड्रामा सचमुच रचनात्मकता का एक नया रूप है, या हम एक नए बिजनेस मॉडल को नई कहानी कहने की शैली कह रहे हैं?
ईमानदारी से कहूं तो मैं अभी तक इस बात को स्वीकार नहीं कर पाया हूं कि वर्टिकल ड्रामा रचनात्मकता का कोई नया रूप है।
कम से कम अभी तो नहीं।
जब मैंने पहली बार माइक्रोड्रामा को देखा, तो मुझे इसमें काफी संभावनाएं नजर आईं।
एक नई स्क्रीन।
एक नया दर्शक वर्ग।
कहानी देखने का एक नया तरीका।
और शायद कहानी कहने की एक नई भाषा।
मुझे लगा था कि यह फॉर्मेट लेखकों और निर्देशकों को कहानी कहने के पुराने तरीके पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर करेगा।
लेकिन इस क्षेत्र में जितना काम कर रहा हूं, उतना ही इस संभावना पर मेरा भरोसा कम होता जा रहा है।
क्योंकि धीरे-धीरे ऐसा लगता है कि पूरी इंडस्ट्री एक ही चीज के इर्द-गिर्द घूम रही है—
व्यूज।
एक एपिसोड को कितने व्यूज मिले?
कितने सेकंड बाद दर्शक वीडियो छोड़ रहे हैं?
कहानी में अगला ट्विस्ट कहां आएगा?
कितने एपिसोड तक कहानी को खींचा जा सकता है?
कितनी जल्दी अगली 50 एपिसोड की सीरीज तैयार की जा सकती है?
और फिर…
कितने व्यूज आए?
फिर वही सवाल।
कई बार मुझे लगता है कि माइक्रोड्रामा फिल्ममेकिंग से ज्यादा आईटी इंडस्ट्री की सोच—स्केल, ऑप्टिमाइजेशन, डेटा और परफॉर्मेंस मेट्रिक्स का हिस्सा बनता जा रहा है।
कहानी एक प्रोडक्ट है।
एल्गोरिद्म उसका डिस्ट्रीब्यूटर है।
दर्शक एक डेटा पॉइंट है।
और क्रिएटिविटी स्प्रेडशीट का एक और कॉलम।
यहीं से मेरी असहजता शुरू होती है।
मुझे वर्टिकल स्क्रीन से कोई समस्या नहीं है।
मुझे शॉर्ट फॉर्म एंटरटेनमेंट से भी कोई समस्या नहीं है।
मुझे कमर्शियल सिनेमा से भी समस्या नहीं है।
समस्या सिर्फ इतनी है कि हम फॉर्मेट में बदलाव को रचनात्मकता में बदलाव समझने लगे हैं।
किसी कहानी को वर्टिकल शूट कर देना अपने आप में नई विजुअल लैंग्वेज नहीं बनाता।
60 या 90 सेकंड का एपिसोड बना देना अपने आप में इनोवेशन नहीं है।
हर एपिसोड के अंत में क्लिफहैंगर डाल देना अपने आप में नई कहानी कहने की तकनीक नहीं है।
अगर हम पारंपरिक टीवी मेलोड्रामा को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दें, उसे वर्टिकल शूट करें और मोबाइल स्क्रीन पर दिखाएं, तो क्या वह अपने आप एक नई कहानी कहने की शैली बन जाएगी?
फ्रेम बदल गया है। लेकिन क्या कहानी कहने की भाषा भी बदली है?
यही असली सवाल है।
और सच कहूं तो मैं अभी भी उस जवाब का इंतजार कर रहा हूं।
मैं देखना चाहता हूं कि कोई वर्टिकल फ्रेम का इस तरह इस्तेमाल करे कि मुझे लगे—
“यह कहानी इसी तरीके से कही जा सकती थी, किसी और तरीके से नहीं।”
मैं लेखकों को कहानी की संरचना के साथ प्रयोग करते देखना चाहता हूं।
निर्देशकों को एक नई विजुअल ग्रामर बनाते देखना चाहता हूं।
अभिनेताओं को उस खास तरह की नजदीकी के साथ खेलते देखना चाहता हूं, जो मोबाइल स्क्रीन दर्शक और किरदार के बीच पैदा करती है।
मैं खामोशी देखना चाहता हूं।
सबटेक्स्ट देखना चाहता हूं।
विजुअल स्टोरीटेलिंग देखना चाहता हूं।
संयम देखना चाहता हूं।
ऐसी कहानियां देखना चाहता हूं जो यह समझती हों कि दर्शक अपने हाथ में मौजूद एक छोटी-सी स्क्रीन से कहानी देख रहा है।
लेकिन फिलहाल बहुत कुछ ऐसा दिखाई देता है—
ज्यादा ट्विस्ट।
ज्यादा एपिसोड।
ज्यादा ड्रामा।
ज्यादा प्रोडक्शन।
ज्यादा कंटेंट।
ज्यादा व्यूज।
और इस ‘ज्यादा’ की दौड़ में कहीं न कहीं कहानी छोटी होती जा रही है।
हो सकता है मैं गलत हूं।
हो सकता है कि वर्टिकल स्टोरीटेलिंग अभी अपने शुरुआती दौर में हो और इसे अपनी भाषा खोजने में समय लगे।
सिनेमा को भी अपनी भाषा खोजने में दशकों लगे थे।
टेलीविजन को भी।
शायद वर्टिकल स्टोरीटेलिंग को भी समय चाहिए।
लेकिन एक बात को लेकर हमें सावधान रहना चाहिए—
कोई फॉर्मेट व्यावसायिक रूप से सफल हो सकता है, बिना इसके कि वह रचनात्मक रूप से महत्वपूर्ण भी हो।
माइक्रोड्रामा एक बहुत बड़ा उद्योग बन सकता है।
अरबों व्यूज हासिल कर सकता है।
हजारों लोगों को रोजगार दे सकता है।
बड़े-बड़े प्लेटफॉर्म खड़े कर सकता है।
लेकिन इनमें से कोई भी चीज अपने आप इसे रचनात्मक क्रांति नहीं बना देती।
क्योंकि—
व्यूज ध्यान को मापते हैं।
जरूरी नहीं कि वे कल्पना को भी मापें।
इसीलिए मैं वर्टिकल ड्रामा को खारिज नहीं करना चाहता।
मैं इसे चुनौती देना चाहता हूं।
मैं चाहता हूं कि इस इंडस्ट्री को बनाने वाले लोग सिर्फ यह सवाल न पूछें—
“एक और मिलियन व्यूज कैसे लाएं?”
बल्कि यह भी पूछें—
“हम यहां ऐसा क्या बना सकते हैं, जो इससे पहले कभी नहीं बनाया गया?”
क्योंकि नई स्क्रीन हमेशा नई भाषा नहीं होती।
लेखक: आनंद कुमार दुबे (क्रिएटिव प्रडूसर व शो रनर)