मुंबई। हिंदी सिनेमा में अक्सर किसी फिल्म की सफलता का पैमाना उसका बजट, स्टारकास्ट और बड़े स्तर पर किया गया प्रचार माना जाता है। लेकिन इन दिनों ‘हनुमान अंश’ ने इस धारणा को चुनौती देते हुए बॉक्स ऑफिस पर एक ऐसी मिसाल कायम की है, जिसने फिल्म इंडस्ट्री का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा से प्रेरित यह फिल्म महज करीब ₹2 करोड़ के बजट में तैयार हुई है और अब ₹50 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है।
कम बजट, लेकिन दर्शकों का भरपूर प्यार
‘हनुमान अंश’ की कहानी और इसकी प्रस्तुति ने उस दौर में दर्शकों को आकर्षित किया है, जब सिनेमाघरों में बड़े बजट, बड़े सितारों और अत्याधुनिक तकनीक से सजी फिल्मों का दबदबा है।
फिल्म की शुरुआत हालांकि बेहद मामूली रही। रिपोर्टों के मुताबिक, इसने करीब ₹10 लाख की ओपनिंग की थी और शुरुआती दिनों में इसे सीमित स्क्रीन भी मिलीं। लेकिन दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया और वर्ड ऑफ माउथ के चलते फिल्म ने धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ ली।
कुछ ही सप्ताह में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। जो फिल्म शुरुआत में महज कुछ सिनेमाघरों तक सीमित होती दिखाई दे रही थी, उसके शो लगातार बढ़ते गए और चौथे सप्ताह तक यह करीब 1,200 स्क्रीन पर दिखाई जाने लगी।
VFX और CGI के दौर में सादगी की जीत
‘हनुमान अंश’ की सबसे खास बात इसकी सादगी है। फिल्म ने अपनी कहानी कहने के लिए बड़े पैमाने के VFX या CGI तमाशे पर निर्भर होने के बजाय एक संत के जीवन, उनके विचारों और उनकी आध्यात्मिक यात्रा को केंद्र में रखा है।
यही सादगी शायद दर्शकों के साथ फिल्म का सबसे मजबूत कनेक्शन बन गई। फिल्म की कहानी लक्ष्मण दास से नीम करोली बाबा बनने तक की आध्यात्मिक यात्रा को सामने लाती है और भक्ति, आस्था तथा मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखती है।
पहली फिल्म और पहली बड़ी सफलता
फिल्म के निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी के लिए ‘हनुमान अंश’ खास मायने रखती है। यह उनकी बतौर लेखक-निर्देशक पहली फिल्म है। चतुर्वेदी के अनुसार, फिल्म को बनाते समय प्राथमिक लक्ष्य बड़े मुनाफे के बजाय दर्शकों तक कहानी पहुंचाना और लागत निकालना था, लेकिन दर्शकों के प्यार ने उम्मीदों से कहीं आगे जाकर फिल्म को सफलता दिलाई।
फिल्म के प्रमुख कलाकारों में शोबिनव सत्याआ भी शामिल हैं, जिन्होंने नीम करोली बाबा की भूमिका निभाई है। खास बात यह है कि उनका फिल्म से जुड़ना भी किसी कहानी से कम नहीं है। वह शुरुआत में फिल्म की टीम के साथ सहायक निर्देशक के तौर पर जुड़े थे, लेकिन मुख्य अभिनेता के बीमार पड़ने के बाद निर्देशक ने उन्हें भूमिका के लिए आजमाया और अंततः उन्हें बाबा की भूमिका मिली।
स्टार पावर से ज्यादा कहानी पर भरोसा
‘हनुमान अंश’ की सफलता एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या दर्शकों को हर बार बड़े सितारों और भारी-भरकम बजट की ही जरूरत होती है?
फिल्म की सफलता बताती है कि अगर कहानी दर्शकों के दिल तक पहुंचती है, तो सीमित संसाधनों के बावजूद फिल्म लंबी रेस का घोड़ा बन सकती है।
बड़े बजट की फिल्मों के बीच एक छोटी-सी फिल्म का इस तरह उभरना हिंदी सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। खासकर उन स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए, जो सीमित बजट में मजबूत विषयों और कहानियों पर फिल्म बनाना चाहते हैं।
‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी ताकत—दर्शक
फिल्म की कमाई से ज्यादा दिलचस्प इसकी यात्रा है। शुरुआत में लगभग नजरअंदाज की गई फिल्म धीरे-धीरे दर्शकों की चर्चा का हिस्सा बनी और फिर बॉक्स ऑफिस पर लगातार आगे बढ़ती गई।
‘हनुमान अंश’ इस बात का उदाहरण बन गई है कि सिनेमा में कभी-कभी सबसे बड़ा बजट नहीं, बल्कि सबसे सच्ची कहानी जीतती है।
आज जब भारतीय सिनेमा में तकनीकी भव्यता, VFX और बड़े पैमाने की फिल्मों की होड़ है, ऐसे समय में नीम करोली बाबा की सरल और आध्यात्मिक कहानी का करोड़ों दर्शकों तक पहुंचना निश्चित रूप से एक दिलचस्प सिनेमाई घटना है।
और शायद यही इस फिल्म की असली सफलता है—इसने दर्शकों को चकाचौंध से नहीं, बल्कि कहानी और भावनाओं से जोड़ने की कोशिश की।
आनंद कुमार दुबे