नये दौर में अमेरिका- भारत रिश्ते।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमेरिका दौरा इस बार मई मायने में ख़ासा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी इस बार राजकीय अतिथि बनकर अमेरिका गेट हैं। यह अमेरिकी इतिहास में पहली बार है कि भारत का कोई प्रधानमंत्री अमेरिका राष्ट्रपति का अतिथि बना है। इसके पहले इस तरह का गौरव दुनिया के केवल दो व्यक्तियों को ही मिला है और तीसरे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। इस दौरे पर दुनिया के सभी देशों की निगाहें लगी हुई है। न केवल भारत और अमेरिका के लोगों की हलचलें तेज है बल्कि पूरी दुनिया की नजर इस दौरे पर टिकी है। उधरपाकिस्तान और चीन के खेमे में भी हलचल तेज है। दोनों देश परेशान नजर आ रहे हैं। दुनिया के बड़े देशों में अभी भारत ही ऐसा देश हैजो पूरी तरह से गुट निरपेक्ष है। मतलब किसी भी गुट में शामिल नहीं है। इसके बावजूद हर गुट का पसंदीदा देश बना हुआ है। भारत के रूस से भी अच्छे रिश्ते हैं और अमेरिका से भी।

भारत तेजी से वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है। ऐसे में पीएम मोदी राजकीय दौरे पर अमेरिका जा रहे हैं। राजकीय दौरा इसलिए अहम होता है क्योंकि इसका पूरा खर्च मेजबान देश ही करता है। पीएम मोदी 21 जून को योग दिवस के जरिए भारतीय संस्कृति और सभ्यता का प्रसार पूरी दुनिया में करेंगे। इसके बाद वह जो बाइडेन के साथ बैठक करेंगे। इस बैठक में भारत और अमेरिका के बीच कई रणनीतिक साझेदारी भी होगी। डिजिटल इकॉनमीअंतरिक्ष मिशनरक्षाव्यापार समेत कई बिंदुओं पर दोनों देशों के बीच समझौते होंगे। इससे साफ है कि भारत की ताकत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से बढ़ेगी। रक्षा उत्पादों की खरीदारी को लेकर भी दोनों देशों के बीच डील हो सकती है।

पश्चिमी देशों से एशिया को प्रशांत क्षेत्र ही जोड़ता है। यहां 50 से ज्यादा छोटे देश और आईलैंड हैं। इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना के तहत पापुआ न्यू गिनी के करीब सोलोमन द्वीप समूह के साथ एक सुरक्षा समझौता किया थाजिसके बाद चीन ने राजधानी होनियारा में बंदरगाह बनाने का एक अनुबंध हासिल किया। चीन के इस कदम को देखते हुए पापुआ न्यू गिनी बीजिंग की ओर झुकाव दिखा रहा हैजो क्वाड समूह के देश भारतअमेरिकाजापान और ऑस्ट्रेलिया के लिए एक बड़ी चिंता है। पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री जेम्स मरापे ने साल 2022 में बैंकॉक में चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग से मुलाकात की थीजिसके बाद बीजिंग ने कहा था कि चीन और पापुआ न्यू गिनी दोनों अच्छे दोस्त हैं। 

अब पश्चिमी देशों ने हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र के देशों को एकजुट करने के लिए भारत को आगे किया है। भारतीय पीएम मोदी इसे बखूबी कर भी रहे हैं। पिछले दिनों जब पीएम मोदी पापुआ न्यू गिनी पहुंचे थेतो वहां के प्रधानमंत्री ने पीएम मोदी के पैर छूकर उनका अभिवादन किया था। इसके अलावा भारतीय प्रधानमंत्री पहली बार फोरम फॉर इंडिया पैसिफिक आईलैंड को-ऑपरेशन यानी FIPIC में शामिल हुए। इसके जरिए उन्होंने हिंद क्षेत्र में चीन के बढ़ते कदम को रोकने की दिशा में पहला और बड़ा कदम बढ़ाया। जिस तरह से प्रशांत क्षेत्र में बसे देश और आईलैंड्स ने पीएम मोदी का स्वागत कियावो भी बड़ा कूटनीतिक संदेश दे रहा है। अमेरिका चाहता है कि पीएम मोदी प्रशांत महासागर क्षेत्र के साथ-साथ अन्य एशियाई देशों को एकजुट करें और उसका नेतृत्व करें। इससे चीन का प्रभाव कम हो सकता है। पीएम मोदी अपने इस दौरे के दौरान अमेरिका के कई बड़े उद्योगपतियों के साथ मुलाकात करेंगे। कारोबारियों से मुलाकात के दौरान भारत में निवेश को लेकर भी बातचीत होगी। बताया जाता है कि इस दौरान माइक्रॉन टेक्नोलॉजी एक अरब डॉलर से अधिक के निवेश का ऐलान कर सकता है।

पीएम मोदी के अमेरिका दौरे को लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर का भी बयान आया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका की राजकीय यात्रा के महत्वपूर्ण नतीजे होंगे। यह पहली बार होगा जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री अमेरिकी कांग्रेस को दूसरी बार संबोधित करेंगे। विदेश मंत्री ने आगे कहा कि जब कोई प्रधानमंत्री किसी देश का दौरा करता हैतो इससे हमारे (भारत के) संबंध आगे बढ़ते हैं। मैं समझता हूं कि यह एक भूमंडलीकृत दुनिया हैइसलिए यदि कुछ होता हैतो इसका दूसरों पर प्रभाव पड़ भी सकता है और नहीं भी। हम अपने हितों के लिएअपने संबंधों के नजरिए से इसे देखते हैं। इसे समझने के लिए हमने विदेश मामलों के जानकार डॉ. आदित्य पटेल से बात की। उन्होंने कहा, ‘दुनिया में भारत की बढ़ती धमक से चीन और पाकिस्तान पहले से ही परेशान हैं। एक तरफ पाकिस्तान में कई तरह की समस्याएं हैं तो दूसरी ओर चीन भी लगातार विवादों में घिरा हुआ है। ऐसे समय में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। इससे दोनों देश चिंतित हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि अगर भारत का विकास हो जाएगा तो इससे दुनिया में उनकी अहमियत खत्म हो जाएगी।

भारत तेजी से एशियाई और हिंद प्रशांत क्षेत्र के देशों को अपने साथ जोड़ रहा है। अगर ऐसा हो जाता है तो इसका सीधा नुकसान चीन और पाकिस्तान को होगा। ये दोनों देश कमजोर और अलग-थलग पड़ जाएंगे। इसके अलावा अमेरिका व पश्चिमी देशों की मदद से भारत उत्पाद के क्षेत्र में भी आगे बढ़ रहा है। भारत में कई चीजों का उत्पाद शुरू हो गया हैजिसके लिए पहले लोग चीन पर निर्भर रहा करते थे। अब चूंकि भारत में भी उत्पाद होने लगा है तो लोग चीन की बजाय भारत की तरफ देखने लगे हैं। इससे भारत की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है। उधरचीन को इससे झटका महसूस हो रहा है।

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